We Offer a full range of Professional mental Health services to children, Adults, Couples, and Families.

As the name shows , spirit + Medicure . Means soul powers +treatment,

Soul power : Every human has its own power to heal himself/herself physically mentally both. But doesn't know about it, how to do this, So here we support the method.
Mentally: our mind has unlimited powers , to apply these Powers we can do everything so we improve these Devine powers. And then Devinity works itself own. Not you.

पूरे विश्व में एक चेतन शक्ति कार्य करती है।वही चेतना कण कण सु व्याप्त है।इसी चेतना के कारण पूरा संसार गतिशील है।इस गतिशीलता की प्रेरणा हर प्राणी को अपने अंदर से मिलती है।और यही प्रेरणा ही आध्यात्मिक ज्ञान है। ये आध्यात्मिक ज्ञान प्राणी के संस्कारों और विचारों पर आधारित है। जैसे संस्कार और विचारों का अभ्यास करते जाएंगे वैसी वैसी प्रेरणा मिलती जाएगी। भगवान कृष्ण ने भी"गीता"में कहा है कि हेअर्जुन नित अभ्यास और नित वैराग्य से ही मैं (परमात्मा) मिलता हूं। भक्त के लिए परमात्मा ही मंजिल है।

Spiritiolity

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"मन" पर नियंत्रण कैसे करें ?

मन पर नियंत्रण हम तभी कर सकते हैं जब हम इसके स्त्रोत को समझ सकें| जहाँ से जिस बिंदु से मन का जन्म होता है उसे समझना आवश्यक है| मन की उत्पत्ति प्राण-तत्व से होती है| प्राण-तत्व की चंचलता ही मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के रूप में व्यक्त होती है| प्राण की चंचलता को स्थिर कर के ही हम मन को वश में कर सकते हैं| पश्चिमी विचारकों के अनुसार मन एक ही है| पर हिन्दू धर्म-शास्त्रों के अनुसार मन हमारे अंतःकरण का एक भाग है| अंतःकरण के .... मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार .... ये चार भाग हैं| (१) बिना क्रम के लहरों की तरह विचारों का आना "मन" है| (२) विचारों का संगठित रूप "बुद्धि" है जो कुछ निर्णय लेने में समर्थ है जिन्हें शब्दों के द्वारा व्यक्त किया जा सकता है| (३) अव्यवस्थित मन और बुद्धि कुछ भी कल्पना या मानसिक रचना कर लेते हैं, वह "चित्त" है| यह हमारी चेतना का केंद्र बिन्दु है| (४) जो हम नहीं हैं, उसके होने का मिथ्या भाव अहंकार है|

मन की स्वाभाविक चञ्चलता जीवन का चिह्न है| मन को उपयोगी काम में लगाने और चिंता से मुक्त करने के लिए दैनिक अभ्यास आवश्यक है| मन को वश में करने के लिए ..... (१) उसे किसी बीज मंत्र से जोड़ना आवश्यक है| उचित बीजमंत्र का ज्ञान तो एक सद्गुरु ही करा सकते हैं| (२) बीजमंत्र के साथ साथ मन को मेरुदंड में सुषुम्ना नाड़ी में होने वाले प्राण-प्रवाह से जोड़ना भी आवश्यक है| इसकी विधि भी कोई सद्गुरु ही सिखा सकते हैं|

सद्गुरु के मार्गदर्शन में साधना कर के उनकी परम कृपा से ही हम चंचल प्राण को स्थिर कर पाते हैं| तभी एकोsहं द्वितीयोनास्ति का भाव आता है| प्राणों की स्थिरता ही शिवत्व में स्थिति है| जब हम सम्पूर्ण समष्टि के साथ एक हो जाते हैं, तब हम पाते हैं कि सिर्फ एक मैं ही हूँ जो जड़-चेतन में सर्वत्र व्याप्त है, मेरे सिवाय अन्य कोई भी नहीं है| यही शिवत्व है और यही निःसंगत्व है|

प्राण तत्व को स्थिर करना ही योग साधना है| यही चित्त की वृत्तियों का निरोध है| इसी के लिए हम यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान करते हैं| चंचल प्राण से ही चित्त की वृत्तियों और मन का जन्म होता है| प्राण का घनीभूत रूप ही कुंडलिनी महाशक्ति है| प्राण तत्व की स्थिरता ही हमें परमशिव की अनुभूतियाँ कराती है| महाशक्ति कुंडलिनी का परमशिव से मिलन ही योग है| जगन्माता की कृपा हम सब पर बनी रहे|

ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ || कृपा शंकर ७ नवंबर २०१९

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"मन" पर नियंत्रण कैसे करें ?

मन का निग्रह।

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SPIRITUALITY

My dear Lord Krishna, you are so kind upon this useless soul, but I do not know why you have brought me here. Now you can do whatever you like with me. But I guess you have some business here, otherwise why would you bring me to this place? Somehow or other, O Lord, You have brought me here to speak about you. Now, my Lord, it is up to you to make me a success or failure as you like. O spiritual master of all the worlds. I can simply repeat your message; so if you like you can make my power of speaking suitable for their understanding. Only by Your causeless mercy will my words become pure. I am sure that when this transcendental message penetrates their hearts they will certainly feel engladdened and thus become liberated from all unhappy conditions of life. O Lord, I am just like a puppet in your hands. So if you have brought me here to dance, then make me dance, make me dance,

O Lord, make me dance as you like. I have no devotion, nor do I have any knowledge, but I have strong faith in the holy name of Krishna. I have been designated as Bhaktivedanta, one who possesses devotion and knowledge, and now, if you like, you can fulfill the real purport of Bhaktivedanta. Signed, the most unfortunate, insignificant beggar, A.C. Bhaktivedanta Swami, On board the ship Jaladuta, Commonwealth Pier, Boston, Massachusetts, U.S.A. 18th of September, 1965

Radhanath Swami, The Journey Home

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